धुआँ थमेगा, निशानी रहेगी? कोयला विद्युत के पर्यावरणीय बोझ की विरासत
ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) पर आजकल बहुत चर्चा हो रही है। इस परिवर्तन का एक प्रमुख पहलू है विद्युत उत्पादन के लिए ऊर्जा स्रोतों में बदलाव—कोयले से सौर उर्जा, पवन उर्जा और अन्य गैर-कार्बन स्रोतों की ओर।
कोयलावर्तमान में हमारे विद्युत तंत्र का मुख्य आधार है, लेकिन इस के अनेक गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव है। दुर्भाग्यवश, इनमें से कई प्रभाव अब तक अनसुलझे हैं और वे स्थानीय पारिस्थितिकियों, आजीविकाओं तथा समुदायों के स्वास्थ्य के लिए लगातार खतरा बने हुए हैं। यदि इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो वे कोयले से दूर जाने वाले उर्जा परिवर्तन की एक स्थायी और अवांछित विरासत बन जाएंगे।
ये विरासतें दो कारणों से चिंता का विषय हैं। पहला, ये विरासतें पर्यावरण, समाज और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालती रहती हैं। दूसरा, चूँकि ये विरासतें मुख्यतः वे समस्याएँ हैं जो विद्यमान (पर्यावरणीय और अन्य) कानूनों का पालन ना करने से उत्पन्न हुई हैं, वे मूलतः कानून के उल्लंघन की भौतिक अभिव्यक्तियाँ हैं।
यह रिपोर्ट उन विरासतों पर विस्तार से चर्चा करती है जो कोयला-आधारित बिजली उत्पादन से जुडी सभी गतिविधियों द्वारा पीछे छोड़ी जा रही हैं– जैसे फ्लाई ऐश (लीगेसी ऐश) की विरासत, कोयला वॉशरीज़ की विरासत, उन कोयला खानों की विरासत जो अपने जीवन के अंत तक पहुँच चुकी हैं और बंद होने की प्रक्रिया में हैं, उन ताप विद्युत संयंत्रों की विरासत जो बंद होंगे, और अंततः उस मानसिकता की विरासत जिसने पारंपरिक ऊर्जा अवसंरचना की योजना और निर्माण की दिशा तय की है।
ऊर्जा परिवर्तन के चलते अन्य समस्याएँ भी खड़ी हो सकती है — जैसे विद्युत संयंत्रों और कोयला खानों के श्रमिकों का भविष्य, या कोयला-आधारित गतिविधियों के बंद होने से स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने वाले प्रभाव। इस रिपोर्ट में हम ने कोयला-आधारित गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों की विरासतों पर ध्यान केंद्रित किया हैं, विशेषकर वे जो जल और भूमि पर असर डालते हैं।
रिपोर्ट कई सिफारिशें प्रस्तुत करती है और आग्रह करती है कि सभी प्रयासों में प्रभावित लोगों और समुदायों को केंद्र में रखा जाए।
यह रिपोर्ट श्रीपाद धर्माधिकारी द्वारा विकल्प सामाजिक संस्था के लिए लिखी गई है, जिसने इसे प्रकाशित भी किया है।