Lucknow Workshop

उत्तरप्रदेश में जल नियामक आयोग के प्रभावों पर
गाँधी भवन, लखनऊ, (उ॰प्र॰) में 3 दिसंबर 2008 को आयोजित

कार्यशाला का कार्यवृत्त

 

उद्घाटन सत्र 

(सत्र संचालन – श्री पुष्पेन्द्र भाई)

सत्र की शुरूआत सहभागियों के परिचय से हुई।

कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए मंथन अध्ययन केन्द्र के श्री रेहमत ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों की शर्तों के तहत पानी के क्षेत्र में भी नीतिगत बदलाव किए जा रहे हैं। ये बदलाव उत्तरप्रदेश या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं हैं बल्कि देश के लगभग हर राज्य में यह प्रक्रिया जारी है। आम जनता पर इससे पड़ने वालें प्रभावों को समय रहते समझने की आवश्यकता है। उत्तरप्रदेश के पूर्व महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश में जल नियामक आयोग संबंधी कानून बनाये जा चुके हैं। मध्यप्रदेश में भी कानून का प्रारूप तैयार है और यह कभी भी कानून का रूप ले सकता है। ‘मंथन’ और ‘प्रयास समूह’ चाहते हैं कि इस कानून के संबंध में जनमत बनें। उत्तरप्रदेश में कार्यरत समूहों/साथियों से चर्चा में उभरकर आया कि इस विषय पर एक छोटी कार्यशाला आयोजित की जाए ताकि विस्तृत चर्चा हो सके, इसके संबंध में साझा रणनीति की दिशा तय की जा सके। इसी उद्देश्य के तहत यह कार्यशाला आयोजित की गई है।

क्षेत्र सुधार के कर्ज की राजनीति पर विचार व्यक्त करते हुए ‘मंथन’ के श्री गौरव द्विवेदी ने कहा कि वित्तीय एजेंसियों द्वारा नब्बे के दशक के पूर्व तक दिए जाने वाले कर्ज परियोजना आधारित होते थे। अब इन कर्जों के साथ पूरे क्षेत्र में बदलाव (सुधार या रिफार्म) की शर्तें लादी जाती हैं। इसी प्रकार के कर्जों की शर्तों के तहत बैंक, बीमा, स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती, परिवहन, पानी आदि हर क्षेत्र में बदलाव आ रहे हैं।

इसे समझने के लिए 20.30 वर्ष पीछे मुड़कर देखते हैं, जब विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम शुरू किया था। इसके तहत देशों से अपने बाजार खोलने तथा सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण को प्रमुखता देने आदि की शर्तें रखी थी। इससे सेवाओं की कीमतें काफी बढ़ गई थी। इस कारण अर्जेन्टाईना में ब्यूनस आयर्स, कोचाबांबा सहित पूरे लेटिन अमेरिका में ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम का कड़ा विरोध हुआ।

इन अनुभवों के बाद विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष को जब महसूस हुआ कि देशों पर दबाव डालकर ढाँचागत समायोजन कार्यक्रम लागू करवाना कठिन है तो फिर ‘क्षेत्र सुधार’ का एजेण्डा आगे बढ़ाया गया। इसके तहत राजकोषीय घाटा कम करने के नाम पर आवश्यक सेवाओं के निजीकरण की वकालत की गई है। निजीकरण को आगे धकेलने हेतु नीतिगत और संस्थागत बदलाव किए जा रहे हैं। जल नियामक आयोग कानून भी इसी शृंखला की एक कड़ी है। ये नियामक आयोग पानी का बाजार खड़ा करने में मदद करेंगें। अब पूँजीवाद के बजाय नवउदारवादी व्यवस्था की बात कही जा रही है, जिसमें सरकार की भूमिका सिर्फ फेसिलिटेटर के रूप में सीमित कर दी गई है। सेवा उपलब्ध करवाना अब सरकार की जिम्मेदारी नहीं रह गई है।

देश के 17.18 राज्यों में विश्व बैंक ने सेक्टर रिफार्म या क्षेत्र सुधार के कर्ज दिए हैं। इन कर्जों की शर्तें हर राज्य में समान हैं जबकि एक ही राज्य की सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक स्थितियाँ काफी भिन्न है। इन कर्जों में विश्व बैंक, एडीबी, डीएफआईडी, यूएसएड, जेबीआईसी के साथ पानी का धंधा करने वाली अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सलाहकारों की भूमिका है। इनका कहना हैं कि बुनियादी सेवाओं का सुधार सार्वजनिक क्षेत्र के बस की बात नहीं है।

इन कर्जों के संबंध में राज्य सरकारों की कोई हैसियत ही नहीं है। ये कर्ज एक सुनियोजित नीति के तहत थोपे जाते हैं। सलाहकारों की अध्ययन रिपोर्टें सेक्टर रिफार्म को  रामबाण औषधि के रूप में प्रस्तुत करती है। कर्ज स्वीकृत करवाने में उन नौकरशाहों की निर्णायक भूमिका होती है जो विश्व बैंक की नौकरी कर वापस सरकार में लौटते हैं। विश्व बैंक की नौकरी के दौरान उन्हें मोटी तनख्वाह देकर इस बात की ट्रेनिंग दी जाती है कि वापस सरकार में लौटकर उन्हें किस प्रकार वित्तीय एजेंसियों के एजेण्डे को आगे बढ़ाना है। वर्तमान में सरकार में शामिल शीर्ष राजनेता और नौकरशाह किसी न किसी रूप में लम्बे समय तक इन वित्तीय एजेंसियों से जुड़े रहे हैं।

‘तरूण भारत संघ’ के श्री राजेन्द्र सिंह ने कहा कि आजादी के बाद रिफार्म शब्द एक अच्छा संदेश देता था लेकिन आज का रिफार्म भयानक है। जल का अतिदोहन रोकने तथा इसके समानतापूर्ण बँटवारे के नाम पर पानी के निजीकरण की प्रक्रिया जारी है। पानी का निजीकरण रोकने के लिए बड़ी कंपनियों को रोकना होगा। पानी पर सबका समान अधिकार होना चाहिए। इसकी निगरानी समुदाय के स्तर पर भी आसानी से की जा सकती है।

जब राजस्थान की जल नीति बन रही थी तो हमने मुद्दा उठाया कि पानी राज्य का विषय है, इसलिए जल नीति राज्य के लोगों की भावनाओं के अनुरूप होनी चाहिए। इसके लिए हमने मानव के पीने के पानी को पहली प्राथमिकता, मानव के जीवन में सहायक पशुओं को दूसरी, खाद्यान्न पैदा करने वाली खेती को तीसरी, अन्य खेती को चैथी तथा पर्यावरण हेतु पानी को पाँचवी प्राथमिकता दी। हमने माँग की कि पानी के बाजारीकरण के बजाय इसका सामुदायीकरण होना चाहिए। यदि राज्य इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी नहीं ले सकता तो समुदाय को यह जिम्मेदारी दी जाए। 5 वर्ष के बाद हाल ही में आई राजस्थान की प्रारूप जल नीति में प्राथमिकताओं का क्रम वही है जो हमने सुझाया था।

नियामक आयोग के प्रभावों की धार भोंथरी करने के लिए राज्य की जल नीतियों को प्रभावित करने की आवश्यकता है। पानी की लायसेंसिग नहीं होना चाहिए। इसके बजाय निश्चित क्षेत्र में वाटर टेबल तय कर दिया जाना चाहिए। जिस स्तर तक गाँव का किसान पानी ले सकता है कंपनियों को भी उसी स्तर तक ही पानी लेने का अधिकार होना चाहिए। जो जितना पानी लेता है उसकी जिम्मेदारी कम से कम उतने पानी के रिचार्ज की होनी चाहिए।

सारे देश में एक जैसा पानी का प्रबंधन नहीं हो सकता। जल नीति में स्थानीय समुदाय के सामाजिक ताने-ताने और और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति के साथ भू-सांस्कृतिक विविधताओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लखनऊ और दिल्ली में बैठकर कारगर जल नीति नहीं बनाई जा सकती है। इसलिए इस समय नीति निर्माताओं को इस बात के लिए बाध्य किए जाने की जरूरत है कि वे भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों के आधार पर जल नीतियाँ बनाएँ जिसमें स्थानीय समुदाय और पारिस्थिकी का ध्यान रखा जाए।

भारत की नदियों पर अतिक्रमण, शोषण और प्रदूषण के खतरे हैं। जिनके कारण देश में नदियाँ मर रही है, बाढ़ और सुखाड़ की आपदाएँ पैदा हुई। ये आपदाएँ पानी का व्यापार करने वाली कंपनियों के लिए फायदे का सौदा है। मौजूदा नीतियाँ इसी को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है ताकि पानी का बाजारीकरण किया जा सके और जल संसाधनों को निजी हाथों में सौंपा जा सके। लेकिन हमें सावधान रहना है।

आजादी बचाओ आंदोलन के श्री मनोज त्यागी के अनुसार यहाँ की अधिसंख्य जनसंख्या खेती पर निर्भर है। प्रदेश के सिंचाई मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने विश्व बैंक की भाषा में पानी का दुरूपयोग होने की बात कहीं है। उनका यह इशारा किसानों की ओर था। इस दुरूपयोग को रोकने हेतु उन्होंने जल नियामक कानून की अनिवार्यता जाहिर की।

किसानों की सिंचाई के लिए हरिद्धार से कानपुर तक आने वाली अपर गंगा नहर को मुरादनगर के पास रोक कर पानी को दिल्ली में ले जाने हेतु एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी को ठेका दिया गया था। इस पानी का बड़ा हिस्सा पार्क, होटल, माॅल्स आदि के लिए दिया जाना था। खेती के हिस्से का पानी गैर कृषि कार्यों हेतु अंतरित कर दिया गया था। नियामक आयोग के बाद ऐसा हस्तांतरण और आसान हो जायेगा। किसानों के हिस्से का पानी उद्योगों और शहरों के लिए चला जायेगा।

उत्तरप्रदेश में बनारस, हाथरस, बलिया और गाजि़याबाद में कोका कोला कंपनी के खिलाफ आंदोलन जारी हैं। इस लड़ाई का मुद्दा यह है कि पानी पर अधिकार ग्राम समुदाय का है या कंपनियों का। पानी पर हक की इस लड़ाई का फैसला निजी कंपनियों के पक्ष में करने में नियामक कानून का इस्तेमाल किया जाएगा।

पानी की लड़ाई उसी व्यापक लड़ाई का ही हिस्सा है, जिसमें जमीन, जंगल, खदान, खेती, खुदरा व्यापार, छोटे उद्योग, बैंक, बीमा आदि सभी का निजीकरण किया जा रहा है। इस मामले में भारत सरकार विश्व व्यापार संगठन, बहुराष्ट्रीय निगमों, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के एजेंट की भूमिका निभाते हुए देशवासियों पर ऐसे कानून थोप रही है। सरकार की इस नीति के खिलाफ तुरन्त साझे और कड़े संघर्ष की जरूरत है। यदि हमने देर की तो पूरा उत्तरप्रदेश पानी की मण्डी में तब्दील हो जायेगा और हमारी लड़ाई कठिन हो जाएगीं

सत्र संचालक की टिप्पणी – विश्व बैंक ने संसाधनों के निजीकरण के बीज उत्तरप्रदेश में अपने पहले कर्ज के साथ 1961 में बो दिए थे। बुंदेलखण्ड में विश्व बैंक समर्थित चकबंदी के दुष्परिणाम 40 वर्ष के बाद दिखाई दे रहेे हैं। पहले समाज का अपना जल प्रबंधन था। पानी का संकट होते हुए भी कभी पलायन नहीं होता था। लोग मरते नहीं थे। लेकिन पिछले 5 वर्षों में बुंदेलखण्ड में करीब 5 हजार लोगों को आत्महत्या करनी पड़ी। गाँवों से 50.60ः  तक लोग पलायन कर गए हैं। इसी नीति के तहत निर्माणाधीन केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना भी क्षेत्र के लिए अभिशाप बनेगी। सेक्टर रिफार्म का ध्येय वाक्य है – ‘सबका पानी कुछ के लिए’।

विचार सत्र 

(सत्र संचालन – श्री आर॰ पी॰ साही)

‘प्रयास समूह’ के श्री सुबोध वागले ने बताया कि स्वायत्त नियामक तंत्र की शुरूआत 19 वीं सदी के अंत में अमेरिका में हुई थी। उस समय गेहूँ और मक्का के परिवहन का काम रेल्वे से होता था, जिसे निजी कंपनियाँ संचालित करती थी। एकाधिकार के कारण ये कंपनियाँ मनमाना भाड़ा वसूलती थी। जब ऐसा महसूस होने लगा कि निजी कंपनियाँ समाज को बंधक बना रही है तो निजी कंपनियों पर अंकुश लगाने के लिए नियामक तंत्र की स्थापना हुई।

सब्जी, दूध और अखबार वाले अनेक हो सकते है। लेकिन बुनियादी सुविधाओं यथा रेल्वे, बिजली, पानी का सेवाप्रदाता एक ही होता है। सेवाप्रदाता अधिक होने पर बिजली के लिए अलग-अलग पारेषण लाईनें होनी चाहिए। पानी में हर सेवाप्रदाता की सप्लाई लाईनें अलग होना संभव नहीं है। इस प्रकार एक क्षेत्र में किसी सेवाप्रदाता का एकाधिकार हो जाता है। यह एकाधिकार किसी कानून से कायम नहीं होता है बल्कि स्वतः हो जाता है। इसे प्राकृतिक एकाधिकार कहा जाता है। एकाधिकार में अधिक से अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। समाज पर ऐसी नौबत न आए इसलिए अमेरिका में सेवा की दर और सेवा की गुणवत्ता के साथ ही सेवाप्रदाता पर नियंत्रण हेतु नियामक तंत्र का गठन किया गया।

हमारे यहाँ बिल्कुल उल्टा हो रहा है। आजादी के पहले बुनियादी सेवा क्षेत्र का आकार बहुत छोटा था। बाद में बुनियादी सेवाओं की जिम्मेदारी राज्य के हिस्से में आ गई और इन क्षेत्रों में राज्य का प्राकृतिक एकाधिकार कायम हो चुका है। लेकिन राज्य का उद्देश्य मुनाफा कमाना नहीं होने के कारण इस पर नियमन की जरूरत महसूस नहीं हुई। लेकिन 90 के दशक से शुरू हुए आर्थिक सुधारों से निजीकरण को बढ़ावा मिला। इसलिए निवेशकों को इस बात के लिए आश्वस्त किया गया कि राज्य कोई ऐसे निर्णय नहीं लेगा जिससे कि उनका निवेश और मुनाफा प्रभावित हो। यह तभी संभव है जब राज्य को इस मामले से अलग कर दिया जाए। अतः स्वायत्त नियामक आयोगों का गठन किया जा रहा है ताकि राजनैतिक दखलअंदाजी से परे निवेशकों का मुनाफा सुनिश्चित किया जा सकें। इस प्रकार नियामक कानून का प्रमुख उद्देश्य राज्य और निजी निवेशकों के बीच एक बैरियर का काम करना है।

हमारे देश में नियामक कानून बनाने का आधार क्या है? आजादी के बाद बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में राज्य को असीमित अधिकार दिए गए। बिजली बोर्ड, जल बोर्ड आदि का कारोबार यानी निर्णय, क्रियांवयन, नियमन आदि सब राज्य के हाथ में था। निजीकरण के पैरोकारों का कहना है कि राज्य के असीमित अधिकार ही बुनियादी सुविधाओं की बदहाली का कारण है। राज्य के हस्तक्षेप के कारण सुविधाओं का नौकरशाहीकरण हो गया है और इन पर लोगों के बजाय निहित तत्वों का कब्जा हो चुका है। पारदर्शिता, जवाबदेही खत्म हो गए। इन बोर्ड सदस्यों की चयन प्रक्रिया निरर्थक हो चुकी है। इसलिए सेवा प्रदाय का काम राज्य से अलग किया जाए। संचालन और संधारण लोगों के हाथ में सौंपा जाए। राज्य के अधिकारों को कम किया जाए।

नियामक आयोग में नौकरशाह, तकनीकी और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ शामिल रहेंगें। इसमें राज्य अथवा समाज के प्रतिनिधियों के लिए कोई स्थान नहीं है। वित्तीय एजेंसियों का कहना है कि अभी तक राजनैतिक और सामाजिक प्राथमिकताओं के आड़ में आर्थिक और तकनीकी पक्षों को नकारा गया। इसलिए नियामक आयोग में अब इसकी जरूरत नहीं हैं। पहले आर्थिक और तकनीकी मामलों पर ध्यान देना चाहिए।

नियामक आयोग इस पर नियंत्रण रखेगा कि जल क्षेत्र में सरकार और गैरसरकारी इकाईयाँ आर्थिक और तकनीकी जरूरतें पूरी करती है या नहीं। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि निजी कंपनियों में राज्य का हस्तक्षेप न हो। ग्राहकों के अधिकारों का भी संरक्षण किया जाएगा। यह अर्ध न्यायिक व्यवस्था होंगी अर्थात् इसमें तथ्यों के बारे में न्यायालयों के समान कठोरता नहीं होंगी। नियामक आयोग की भूमिका एडजूसीकेटरी अर्थात् मध्यस्थ की होंगी। इसके सामने जो तथ्य प्रस्तुत किए जाएँगे सिर्फ उन्हीं के आधार पर निर्णय लिए जाएँगें। जो तथ्य सामने नहीं आयेंगें उन्हें सामने लाने की जिम्मेदारी इनकी नहीं होंगी। ऐसे में जिनके पास तकनीकी भाषा में अपना पक्ष रखने का कौशल अथवा महँगे विशेषज्ञों की सेवाएँ लेने की क्षमता नहीं हैं, उनके साथ न्याय होने की संभावना अत्यंत क्षीण है। नियामक आयोग अपने फैसले पानी को ‘बुनियादी अधिकार’ के बजाय ‘वस्तु’ मानते हुए करेंगें।

नियामक तंत्र के बारे में कहा गया है कि यह पारदर्शिता, सहभागिता और जवाबदेही से काम करेगा। लेकिन, ये पारदर्शिता, सहभागिता और जवाबदेही लोगों के प्रति न होकर निवेशकों के लिए होगी। आयोग की कार्यप्रणाली निवेशक हितैषी है। इस पर पूरा नियंत्रण नौकरशाहों का है। महाराष्ट्र में इसका अध्यक्ष रिटायर्ड मुख्य सचिव ही हो सकता है। इसकी चयन प्रक्रिया में भी नौकरशाहों का नियंत्रण होता है। आयोग का मात्र आर्थिक और तकनीकी दृष्टि से काम करना अराजनैतिक तथा अलोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इससे गरीबों के हित बुरी तरह से प्रभावित होंगें।

‘प्रयास समूह’ के श्री सचिन वारघड़े ने बताया कि उत्तरप्रदेश के नियामक आयोग संबंधी कानून में नियामक आयोग को मिले अधिकारों में जल अधिकार (एनटाईटलमेंट) सुनिश्चित करना शामिल है। ये जल अधिकार वास्तव में पानी के उपयोग के अधिकार मात्र होंगें, मालिकाना हक नहीं। हालाँकि यह निरंतर अधिकार होगा तथा इसे कानूनी मान्यता भी होंगी। किसे कितना उपयोग अधिकार मिले यह शासन तय करेगा। महाराष्ट्र के नियामक कानून में तो इस एनटाईटलमेंट को खरीदी बिक्री योग्य माना गया है अर्थात् पानी के बाजार को कानूनी जामा पहना दिया गया है। इस बात की बहुत संभावना है कि इसी प्रकार उत्तरप्रदेश में भी नियामक कानून का उपयोग कर पानी का बाजार खड़ा किया जाएगा। एनटाईटलमेंट का निर्धारण ही पानी का बाजार खड़ा करने की पूर्व शर्त होती है। उत्तरप्रदेश के बिल की प्रस्तावना में एनटाईटलमेंट में समानता की बात अवश्य कहीं गई है लेकिन बिल में अन्दर कहीं इसका उल्लेख नहीं है।

पानी को एक सामाजिक संसाधन के रूप में देखा जाता है इसलिए नगर निकायों द्वारा लोगों की क्षमता के आधार पर जल दरें निर्धारित की जाती है। लेकिन अब कानून में पूरी लागत वसूलने का कानूनी प्रावधान किया गया है। महाराष्ट्र के कानून में मात्र संचालन एवं संधारण खर्च निकालने की बात कहीं गई है। उत्तरप्रदेश में संचालन एवं संधारण खर्च के साथ मूल्यह्रास और सब्सिडी तक सारे खर्च की वसूली का प्रावधान किया गया है। यानी लागत खर्च की पाई-पाई वसूली जायेगी।

कानून में सेवाप्रदाता और भू-जल उपयोगकर्ता दोनों के लिए लायसेंसिंग की बात कही गई है। लेकिन इसका जिक्र कानून के अंत में किया गया है। इससे संदेह होता है कि इस तथ्य को छिपाने का प्रयास किया गया है। लायसेंसिंग के कारण उत्तरप्रदेश का कानून महाराष्ट्र के कानून से निजीकरण की दिशा में एक कदम आगे है।

महाराष्ट्र में ‘एकीकृत राज्य जल योजना’ की स्वीकृति जन प्रतिनिधियों की समिति द्वारा देने का प्रावधान है जबकि उत्तरप्रदेश में आयोग को ही यह अधिकार दे दिया गया है। नियामक कानून में एक लाख रूपए तक के भारी जुर्माने का प्रावधान है। पानी के निजीकरण की खुली वकालत की गई है। इस कानून के काफी गंभीर परिणाम होंगें।

सत्र संचालक की टिप्पणी – बुनियादी क्षेत्र में निजी कंपनियों को बढ़ावा देने के संदर्भ में तर्क दिया जाता है कि यह सार्वजनिक क्षेत्र की जिम्मेदारी थी लेकिन उसे पूरा नहीं किया गया इसलिए अब निजीकरण के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। सलाहकारों की रिपोर्टों का हवाला देकर भी इन उपायों को न्यायिक ठहराया जाता है। लेकिन अब इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया है कि सलाहकारों की इन रिपोर्टों के उद्देश्य और उनकी अनुसंशाएँ पूर्व निर्धारित होती है। दुःख की बात है कि आज देश में कोई राज्य ऐसा नहीं है जिसने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों से सेक्टर रिफार्म के कर्ज नहीं लिए हों। विडम्बना यह है कि जो नियामक कानून अमेरिका में निजी कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था उसी का इस्तेमाल हमारे देश में निजी कंपनियों को संरक्षण देने में हो रहा है।

रणनीति सत्र 

(सत्र संचालन – श्री संदीप पाण्डे एवं श्री आर॰ पी॰ साही)

श्री राजेन्द्रसिंह, तरूण भारत संघ

  • उत्तरप्रदेश में जल नियामक आयोग के खिलाफ ठीक समय से गतिविधियाँ शुरू होना अच्छा संकेत है। प्रदेश के सभी 5 भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों (उत्तराखण्ड के नीचे तराई क्षेत्र, दोआबा, बुंदेलखण्ड का पठारी क्षेत्र, अवध और बाढ़ क्षेत्र) में इस कानून को समझने-समझाने हेतु संगोष्ठियाँ/कार्यशालाएँ आयोजित की जाएँ। बाद में सामूहिक बैठक हों।
  • नियामक कानून के खिलाफ दो तरफा लड़ाई लड़ें। कानून को नकारने वाले साथियों के साथ भी हमारी पूरी एकजुटता रहे ताकि सरकार को उसकी हैसियत दिखाई जा सके। साथ ही, नियामक की कमियों को सामने लाएँ और उन पर जनमत तैयार करें। नियामक का उपयोग हमें नदी जल प्रबंधन में, नदियों कों साफ रखने में हस्तक्षेप करने में तथा किसानों/कमजोर वर्गों के अधिकार सुनिश्चित करने आदि में करना चाहिए।
  • उत्तरप्रदेश का जल संकल्प-पत्र तैयार हों जिसमें हम अपनी बातों को साफगोई से रखें कि पानी हमारा है। इसके सामुदायिक प्रबंधन का अधिकार हम बरकरार रखना चाहते हैं। यह अधिकार हम कंपनियों को नहीं दे सकते।
  • उत्तरप्रदेश में लड़ाई लड़ने के लिए पानी की मालिकी का मुद्दा उठाना होगा। पानी का मालिक ‘राज’ नहीं बल्कि ‘समाज’ है। इसलिए नियामक आयोग केवल राज्य का नहीं हो सकता। इसमें समाज के प्रतिनिधियों की संख्या राज्य के प्रतिनिधियों से अधिक होनी चाहिए।

श्री मनोज त्यागी, आज़ादी बचाओ आंदोलन

  •  कार्पोरेट काॅलोनियलिज्म एक नए तरीके का उपनिवेषवाद है जो हर क्षेत्र में घुस आया है, पानी के क्षेत्र में भी। हमारी लड़ाई इसके खिलाफ है। आईएमएफ और विष्व बैंक द्वारा संचालित इस पूरी व्यवस्था को नकारने का और खदेड़ने की जरूरत है। हम इस रिफार्म को स्वीकार नहीं करते। पानी पर समुदाय का अधिकार है। समाज नियमन भी जानता हैं और प्रबंधन भी। इसके खिलाफ जनजागरण के प्रयास तेज करने होंगे।

श्री विमल भाई, माटू जन संगठन

  • पूर्ण विरोध और कानून में सुधार की दो तरफा रणनीति होनी चाहिए। लेकिन इसे नकारने हेतु जोरदार प्रदर्षन जरूरी है। एनपीएम को राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठाना चाहिए।
  • ‘प्रयास’ से निवेदन है कि वह नियामक कानून के बारे में एक सरलीकृत पर्चा तैयार करें ताकि ग्रामीण समुदाय भी उसे पढ़कर समझ सकें।
  • भू-सांस्कृतिक क्षेत्रों में होने वाली कार्यशालाओं हेतु जिम्मेदारी बाँटी जानी चाहिए। उत्तरप्रदेश में कार्यरत समूह क्षेत्रीय स्तर पर इसकी जिम्मेदारी लें। इसमें ‘मंथन’ और ‘प्रयास’ की भी मदद की जरूरत है।

श्री नंदलाल मास्टर, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय

  • प्रदेश के हर क्षेत्र में एक कार्यषाला होनी चाहिए। हम चाहेंगें कि एक क्षेत्रीय कार्यशाला बनारस में भी जरूर हो।
  • संकल्प पत्र जारी कर संदेश दें कि पानी आम जनता का है। इस पर किसी कानून की जरूरत नहीं है।
  • जनवरी और मार्च 2009 के बीच गंगा एक्सप्रेस-वे और पानी के मुद्दे पर पदयात्रा की योजना है। प्रयास है कि 22 मार्च को विष्व जल दिवस के अवसर पर यात्रा का समापन लखनऊ में हो और नियामक कानून की होली जलाए। इसी दौरान अन्य क्षेत्रों के साथी साथी भी अलग-अलग स्थानों से ऐसी ही यात्राएँ निकालें जो 22 मार्च को लखनऊ में इकट्ठा हो।
  • नियामक कानून की जिला मुख्यालयों पर होली जलाई जाए।

श्री पुष्पेन्द्र भाई, जनहित मंच

  • इस बैठक के फाॅलो-अप के बारे में हम उत्तरप्रदेश के साथी भी कुछ जिम्मेदारी लें। हम अपने क्षेत्रों में जाकर जल नियामक आयोग के प्रभावों से समुदायों को अवगत करवाएँ। निश्चित समयसीमा तय कर क्षेत्र में बनी समझ पर के आधार पर एक पत्रक तैयार कर ‘मंथन’ और ‘प्रयास समूह’ को भेजें। इससे इस बैठक की सार्थकता सिद्ध होगी।

श्री आर॰पी॰ साही, इंसाफ

  • सरकार अपनी जवाबदेही कम करने के लिए अपनी भूमिका बदल रही है। लेकिन हमारा मानना है कि नागरिकों को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी सरकार की है जो निजी कंपनियों को अंतरित नहीं की सकती। इसलिए तय करना जरूरी हो गया है कि क्या अब भी हम रिफार्म गतिविधियों में बदलाव की बात करते रहें या फिर इसे सिरे से नकार दें।

श्री अरूण तिवारी, जल बिरादरी

  •  पानी यदि सरकार का नहीं है तो सरकार इसे नियंत्रित कैसे कर सकती है? पानी पर मालिकाना हक तय होना चाहिए। साथ ही आगामी लोकसभा चुनाव में पानी को लेकर एक जन घोषणा-पत्र जारी करें। घोषणा-पत्र पर उम्मीदवारों से सहमति ली जाएँ।
  • उत्तरप्रदेश की नहरों में विश्व बैंक बड़ा निवेश कर रहा है। इस निवेश के पीछे की मंशा को समझाना होगा। माघ मेले के दौरान पूरा उत्तरप्रदेश आपस में जुड़ता है। गाँव समुदाय तक पहुँचने हेतु माघ मेले में कार्यक्रम किया जा सकता है।

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