Bhopal Workshop

जल नियामक आयोग के प्रभावों पर कार्यशाला एवं आमसभा
13 जून 2008, गाँधी भवन, भोपाल (म॰प्र॰) का
कार्यवृत्त

 

उदघाटन सत्र

(सत्र संचालन – श्री अनिल सद्गोपाल)
सबसे पहले स्वागत भाषण तथा उसके बाद सभी प्रतिभागियों का परिचय हुआ।

मंथन अध्ययन केन्द्र‘ के श्रीपाद धर्माधिकारी ने कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए कहा कि जलक्षेत्र में सुधार के नाम पर इस समय कई प्रक्रियाएँ जारी हैं। ‘सुधार’ कार्यक्रमों का मकसद जलक्षेत्र को बाजार में बदल दिया जाना है। इसके परिणामस्वरूप पानी की दरें बढ़ाई जाएगी, पूरी लागत वसूली की जाएगी और इस क्षेत्र पर सरकारी नियंत्रण कम से कम होकर यह क्षेत्र बाजार के अधीन हो जाएगा। इन सुधार कार्यक्रमों में नियामक तंत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगें। पानी सामाजिक संसाधन माना जाता रहा है। आज उसकी बुनियाद बदलकर इसे बाजार की वस्तु बनाया जा रहा है। इसलिए इसे राजनैतिक हस्तक्षेप से पृथक किया जा रहा है।

मध्यप्रदेश में भी बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। विश्‍व बैंक ने 2004 में ‘मध्यप्रदेश जलक्षेत्र पुनर्रचना परियोजना’ के नाम से 39.6 करोड़ डाॅलर का कर्ज दिया है। इस कर्ज के तहत विश्‍व बैंक ने 31 मार्च 2005 तक नियामक आयोग संबंधी कानून का मसौदा तैयार करने की शर्त रखी गई थी। नियामक आयोग के गठन व संचालन के बाद जन सामान्य पर पड़ने वाले प्रभावों की पड़ताल हेतु यह कार्यशाला आयोजित की गई है। हमारे सामने करीब 2 वर्ष पूर्व महाराष्ट्र में गठित देश के पहले ‘जल संपत्ति नियमन प्राधिकरण’ के अनुभव है। जल क्षेत्र सुधार के कार्यक्रम पंजाब, उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड, राजस्थान, तमिलनाडु समेत देश के कई राज्यों में जारी है।

‘प्रयास’ के श्री सुबोध वागळे ने नियामक की अवधारणा स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका अर्थ है नियंत्रण। विभिन्न क्षेत्रों में निजीकरण के कारण जनहित को सुरक्षित रखने हेतु नियामक की आवश्यकता महसूस हुई थी। यह कोई नई परिकल्पना नहीं है, सिर्फ इसका स्वरूप बदला है।

नियामक आयोग के पक्ष में तर्क दिया जाता है कि राज्य को कुछ क्षेत्रों में असीमित अधिकार प्राप्त हैं। इससे सार्वजनिक क्षेत्र की जवाबदेही खत्म हो गई है। भ्रष्टाचार पनपा है और जनहित की उपेक्षा हो रही है। कुल मिलाकर राज्य इन क्षेत्रों में असफल रहा है। फिर भी राज्य के कुछ अंग नियमन करते हैं, यहीं समस्या की जड़ है। इसके इलाज के रूप में ऐसे नियामक तंत्र की वकालत की जाती है जो राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो। इसकी विशेषताओं के बारे में कहा गया है कि यह तंत्र सहभागी, पारदर्शी और जवाबदेह होगा जो उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण करेगा। इससे संबंधित क्षेत्र में पूँजी निवेश आकर्षित होगा और क्षेत्र घाटे से उबर जाएगा।

लेकिन इन नियामक तंत्रों के अनुभव ठीक नहीं रहे हैं। इनकी जवाबदेही आम आदमी के प्रति नहीं थी। इनकी कार्यपद्धति अर्धन्यायिक होने से आम आदमी इनसे न्याय पाने की अपेक्षा नहीं कर सकता है। इस तंत्र की रूचि केवल वित्तीय पहलुओं में ही अधिक देखी गई है। नियामक के सदस्यों की चुनाव प्रक्रिया संदिग्ध होने से इस बात की उम्मीद कम ही होती है कि इसमें बैठे नौकरशाह/व्यवसायी विवेकपूर्ण निर्णय लेंगें।

‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के श्री भगवान मुकाती ने कहा कि विदेशी कर्ज इस देश की जनता पर भारी पड़ रहे हैं। एडीबी के 1600 करोड़ रूपए के कर्ज के बदले प्रदेश के बिजली क्षेत्र में बड़े बदलाव किए गए हैं। विद्युत नियामक आयोग ने आम जनता की उपेक्षा की। सरकार में रहकर एडीबी से व्यवहार करने वाले पूर्व नौकरशाह को ही इस नियामक आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। अब पानी पर नियामक आयोग बनाने का अर्थ है कि सरकार इस कुदरती संसाधन पर भी पहरा लगा देगी। कुओं और ट्यूबवेलों के साथ ही नदी-तालाबों से भी सिंचाई हेतु पानी खरीदना पड़ेगा।

परिवर्तन (दिल्ली) के श्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र को सुनियोजित तरीके से खत्म करने की कोशिशें चल रही है। इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों का बड़ा हाथ है। सुनियोजित तरीके से हमारे नौकरशाहों को विश्व बैंक और अन्य वित्तीय एजेंसियों में Revolving Door  (घुमने वाला दरवाजा जिसके इधर-उधर आसानी हुआ जा सकता है) के माध्यम से भेजा जाता है। वहाँ से लौटकर ये नौकरशाह हमारी सरकार में उन वित्तीय एजेंसियों के एजेंटों की तरह काम करते हैं। उन्होंने कहा कि देश को आर्थिक दिवालियेपन अथवा विदेशी मुद्रा भण्डार संकट के समय इन अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों के कर्ज की जरूरत होती है। लेकिन अभी तो देश में ऐसी स्थिति नहीं है, फिर क्यों अंधाधुंध तरीके से कर्ज लेकर हमारी संप्रभुता गिरवी रखी जा रही है?

उन्होंने दिल्ली में पानी के निजीकरण के खिलाफ की लड़ाई के अनुभवों के आधार पर बताया कि निजीकरण के पक्ष में आधारहीन आँकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। दिल्ली सरकार के अनुसार दिल्ली में प्रति दिन 750 MGD (मिलियन गैलन/दिन) पानी की आपूर्ति की जाती है। अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से 230 लीटर रोजाना। इस प्रकार दिल्ली दुनिया में सबसे अधिक जल उपलब्धता वाला शहर है। लेकिन सरकार का यह भी कहना है कि जीर्ण-शीर्ण लाईनों के कारण आधा पानी जमीन में रिस कर बर्बाद हो जाता है। लेकिन मजेदार बात यह है कि दिल्ली में 6 स्थानों से पानी प्रवेश करता है और इनमें से किसी स्थान पर कोई मीटर नहीं लगा है जिससे दिल्ली में प्रवेश करने वाले पानी की मात्रा का पता लगाया जा सके। अतः स्पष्ट है कि दिल्ली जल बोर्ड के निजीकरण हेतु ही ये थोथी दलीलें दी जा रही थी। उन्होंने पानी के विकेन्द्रित नियोजन पर बल दिया।

निजीकरण के बाद दरों के बढ़ने का कारण सलाहकारों के अत्यधिक ऊँचे वेतन है। निजीकरण हेतु दिल्ली को 21 क्षत्रों में विभाजित किया गया था। विश्व बैंक की शर्त के अनुसार प्रत्येक क्षेत्र के लिए 4 विदेशी सलाहकार नियुक्त किए जाने थे जिनमें से प्रत्येक का वेतन 25 हजार डाॅलर प्रतिमाह रखा गया था। यानी 163 करोड़ रूपए के सालाना बजट वाले दिल्ली जल बोर्ड को सलाहकारों पर ही 100 करोड़ रूपए खर्च करने को कहा गया था।
सत्र संचालक की टिप्पणी – हमारी सरकार बहुत छोटे से कर्जों से सार्वजनिक ढाँचों में बड़े परिवर्तन की रही है जो विशुद्ध रूप से निजी कंपनियों के हित में है। सन् 2001 में देश की सभी राज्य सरकारें प्रारंभिक शिक्षा पर सालाना 40 हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही थी। लेकिन बैंक के मात्र 1100 करोड़ रूपए के अनुदान के लिए औचित्यहीन जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (DPEP)  शुरू कर दिया गया। इस कार्यक्रम के बहाने विश्व बैंक की शर्तों ने देश की शिक्षा व्यवस्था को ध्वंस्त कर दिया। जो सरकारें सालाना 40 हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही थी क्या वे और 1 हजार करोड़ रूपए नहीं जुटा सकती थी?

राजनीति, सामाजिक कर्म और विकास की अवधारणाओं को खत्म करने हेतु हिंदुस्तान पर हमला कर रही ताकतें नवउदारवादी अवधारणाएँ थोप रही है। इन अवधारणाओं का मुकाबला करने हेतु हमारी सोच स्पष्ट होना चाहिए। जब सरकार जनभावनाओं का अनादर कर तानाशाही के रास्ते चलने लगे तो ऐसे समय काॅम॰ शंकर गुहा नियोगी की ‘संघर्ष और निर्माण’ की अवधारणा हमें राह दिखाती है। सही विकास के लिए संघर्ष और निर्माण में संतुलन की आवश्यकता है। राजनैतिक विश्लेषण राजनैतिक कर्म की बुनियाद होती है।

दूसरा सत्र – नियामक तंत्र

(सत्र संचालन – सुश्री नीला हार्डीकर एवं श्री नीलेश देसाई)

‘प्रयास’ की सुश्री कल्पना दीक्षित ने महाराष्ट्र के जलक्षेत्र में 1990 से जारी बदलावों की चर्चा करते हुए कहा कि पानी के उपयोग की प्राथमिकता तय करते समय पेयजल के बाद उद्योग को प्राथमिकता दी है। सिंचाई को तीसरा स्थान दिया गया है। ‘सुधार’ के तहत जो संस्थागत बदलाव हो रहे हैं वे भी निजीकरण की प्रक्रिया को ही मजबूत करने वाले हैं। उन्होंने ‘महाराष्ट्र जल संपत्ति नियमन प्राधिकरण’ के कटु अनुभवों का विस्तार से उल्लेख करते हुए यह भी बताया कि इन अनुभवों से सीख जी जानी चाहिए ताकि यही प्रक्रिया मध्यप्रदेश तथा अन्य राज्यों में न दोहराई जा सके।

‘प्रयास’ के ही श्री सचिन वारघड़े ने ‘महाराष्ट्र जल संपत्ति नियमन प्राधिकरण’ के अधिकारों और गतिविधियों पर प्रस्तुतिकरण देते हुए खुलासा किया कि –

  1. जल नियामक कानून के जल अधिकारों और जल दर निर्धारण के प्रावधानों से पानी पर निजी कंपनियों, उद्योग समूहों और बाजार की ताकतों का कब्जा हो जाएगा
  2. जिन स्थानों पर लोगों के जल संसाधन पर अधिकार स्थापित नहीं हो पाएँगें वहाँ पर बाजार की ताकतों का कब्जा ज्यादा होगा और समुदाय वंचित रहेंगें।
  3. नियामक तंत्र का उपयोग जल संसाधनों पर कब्जे को कानूनी जामा पहनाने में किया जाएगा।

(सुश्री कल्पना दीक्षित का पेपर डाउनलोड करने के लिए यहॉं और सचिन वारघड़े का पेपर डाउनलोड करने के लिए यहॉं क्लिक करें)

नियामक तंत्र के प्रभावों पर चर्चा करते हुए मंथन के श्री रेहमत ने कहा कि इससे राज्य की जनता के प्रति जवाबदेही समाप्त हो जाएगी। पानी का निजीकरण किया जाएगा। विश्व बैंक दस्तावेज में 1 मझौली और 25 छोटी परियोजनाओं के निजीकरण की शर्त रखी गई है। शर्त के अनुसार प्रदेश सरकार ने नियामक कानून का प्रारूप मार्च 2006 में तैयार कर लिया है तथा इसे अंतिम रूप देने हेतु मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में अगस्त 2007 में एक उच्चाधिकार समिति (High Power Panel) गठित की जा चुकी है।

सत्र संचालकों की टिप्पणियाँ – दुनिया में ऐसी तकनीकें खोजी जा चुकी है कि गाँवों के संसाधनों को लूटना आसान हो गया है। संविधान संशोधन के बावजूद स्थानीय प्रशासन की शक्तियों और अधिकारों के संबंध में लचर कानून इस लूट में समर्थन करते नज़र आते हैं। इसलिए अब विधायकों के स्तर पर इस मुद्दे को उठाने का प्रयास करना चाहिए। – सुश्री नीला हार्डीकर
प्रयास के प्रस्तुतिकरणों से सिद्ध हो चुका है कि महाराष्ट्र में समानता और सहभागिता के नाम पर लोगों को छला गया तथा छला जा रहा है। चूँकि मध्यप्रदेश में भी अब इस इतिहास के दोहराये जाने की आशंका है इसलिए हमें सतर्क रहना है। साथ ही हमें विकल्प की रणनीति पर भी चर्चा करनी चाहिए। – श्री नीलेश देसाई

तीसरा सत्र – म॰प्र॰ में सेक्टर रिफार्म परियोजनाएँ

(सत्र संचालन – श्री के॰जी॰ व्यास)

समाजवादी जन परिषद एवं किसान आदिवासी संगठन के श्री सुनील भाई ने कहा कि पारदर्शिता, जवाबदेही, स्वायत्तता और जनभागीदारी जैसे शब्दों से भ्रम फैलाया जा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजयसिंह के काल में जनभागीदारी समिति, रोगी कल्याण समिति, जल उपभोक्ता समिति जैसी समितियाँ गठित की गई थी। इन समितियों द्वारा व्यवस्था नहीं संभाल पाने पर निजीकरण का बहाना आसान हुआ। उन्होंने समाजवादी विचारक स्व॰ किशन मेहता के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि शुद्धिकृत जल प्रदाय ने भी वितरण में असमानता बढ़ाई।

उन्होंने कहा कि एडीबी सहायतित शहरी जलप्रदाय एवं पर्यावरण सुधार परियोजना का मुख्य लक्ष्य है कि सभी से पानी के पैसे वसूल किए जाए। शतप्रतिशत मीटरीकरण से बूँद-बूँद पानी के दाम वसूले जाएँगें। जिनके पास पैसे नहीं है उन्हें पानी नहीं दिया जाएगा। बिजली और शिक्षा से गरीबों को वंचित कर चुकी यह बर्बर व्यवस्था अब उन्हें पानी से भी वंचित करने जा रही है। मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसा दुःखद दिन इसके पूर्व कभी नहीं आया। 2-3 पैसे के पानी को 50 पैसे का पैकिंग कर 12 रूपए में बेचा जा रहा है। यह लूट का नया आयाम है। पारंपरिक लूट के तरीकों से साम्राज्यवादी ताकतें संतुष्ट नहीं है इसलिए उनके एजेंट अब लूट के नए तरीके इजाद करने में लगे हैं। लूटने के लिए एडीबी, विश्व बैंक, डीएफआईडी आदि सब एक हो गए हैं।

पंचायतों को पूर्ण अधिकार नहीं है इसलिए जिले के स्तर पर विधानसभा जैसे ढाँचे का निर्माण करना होगा, जो जिला स्तर पर ऐसे मामले हल करें।

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ साझा संघर्ष की जरूरत है। हमने जंगलों और आदिवासियों को अलग करने वाली विश्व बैंक सहायतित देश की सबसे बड़ी वानिकी परियोजना का विरोध किया तो उसका दूसरा चरण रोक देना पड़ा।

‘दीनबंधु सामाजिक संस्थान’ (इंदौर) के श्री राकेश चाँदोरे ने कहा कि एडीबी की शहरी जलप्रदाय परियोजना इंदौर में शुरू हुए ढाई वर्ष से अधिक बीत चुके हैं लेकिन शहर की बस्तियों में कहीं कोई अंतर नहीं दिखाई देता। शहर की 10 बस्तियों में किए गए अपने अध्ययन के आधार पर उन्होंने बताया कि बस्तियों में जलप्रदाय सुनिश्चित नहीं है। इन बस्तियों में 3 – 4 दिनों में मात्र 20 मिनिट के लिए जलप्रदाय होता है। उसमें भी आधा समय तो गंदा पानी आता है।

‘मंथन’ के श्री गौरव द्विवेदी ने बताया कि सितंबर 2004 में मध्यप्रदेश को विश्व बैंक से 1782 करोड़ रूपये का कर्ज मिला था। इस कर्ज से ‘मध्यप्रदेश जल क्षेत्र पुनर्रचना परियोजना’ संचालित की जा रही है। परियोनजा के तहत प्रदेश के पांच नदी कछारों (चंबल, सिंध, बेतवा, केन और टोंस) में 654 छोटी और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं तथा नहर तंत्रों का सुदृढ़ीकरण एवं आधुनिकीकरण किया जाना प्रस्तावित है। परियोजना की शर्तों के तहत किए जाने वाले बदलावों के प्रभाव अब दिखाई देने लगे हैं।

16 नवंबर 2005 को केबिनेट निर्णय के जरिए सिंचाई दरों में प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत वृद्धि का निर्णय ले लिया गया। अब ये दरें परियोजना के समापन 2009 तक बढ़ाई जाती रहेंगी। जल नियामक तंत्र संबंधी कानून का प्रारूप तैयार कर लिया गया है। राज्य सरकार द्वारा अप्रैल 2008 तक विश्व बैंक की 11 शर्तों का पालन किया जा चुका था तथा शेष 3 शर्तों पर प्रगति जारी है।

सत्र संचालक की टिप्पणी – पानी पर बाजार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए। जलप्रदाय जैसी मूलभूत सेवा को लागत वापसी के सिद्धांत से भी नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इससे बढ़ने वाली अमीरी-गरीबी की खाई समाज को वर्ग संघर्ष की ओर धकेलेगी इसलिए, ऐसे प्रयासों पर लगाम लगनी चाहिए।

चौथा सत्र – म॰प्र॰ में सिंचाई व्यवस्था पर सेक्टर रिफार्म के प्रभाव

(सत्र संचालन – श्री विजय भाई)

‘ग्राम सेवा समिति’, रोहना (होशंगाबाद) के श्री लक्ष्मणसिंह राजपूत ने बताया कि तवा परियोजना (होशंगाबाद) के कमाण्ड क्षेत्र में 156 जल उपभोक्ता समितियाँ गठित की गई है। अभी तक के अनुभवों से स्पष्ट है कि इन समितियों को असफल करने के प्रयास किए जा रहे हैं। पहले नहरों के रखरखाव हेतु 350 रूपए/हेक्टर के हिसाब से राशि आवंटित की जाती थी लेकिन जब से जल उपभोक्ता समितियाँ बनी है यह राशि घटाकर मात्र 50 रूपए/हेक्टर कर दी गई है।

इन समितियों से सामाजिक दृष्टि से संपन्न एवं राजनैतिक दलों से जुड़े लोग शामिल हैं, इसलिए गतिविधियाँ पारदर्शी नहीं है। इन समितियों में प्रशासनिक हस्तक्षेप अधिक है। लेकिन सिंचाई व्यवस्था में कुछ सुधार भी दिखाई दे रहा है। नहर के अंतिम छोर पर पानी पहुँचने लगा है। राजस्व वसूली बढ़ी है। अधिकारियों की बनिस्बत समिति सदस्यों तक किसानों की पहुँच आसान है।

उन्होंने रखरखाव खर्च को अपर्याप्त बताया तथा यह समय पर समितियों को मिलता भी नहीं। समितियों में आम किसानों/महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने तथा समिति सदस्यों के प्रशिक्षण की जरूरत भी बताई।

जल उपभोक्ता समिति के अध्यक्ष श्री चण्डिकेश्वरसिंह तिवारी ने बताया कि जल उपभोक्ता समितियों का गठन पानी का प्रबंधन किसानों के हाथों में देने के उद्देश्य से किया गया है। किसानों को चाहिए कि वे कम पानी वाली फसलों का चयन करें। जल बजट बनाकर फसलें लगाएँ। पहले हमारे क्षेत्र में 2 – 3 सिंचाई का पानी ही मिल पाता था। अब उनकेे अध्यक्ष बनने के बाद सुधार हुआ है। नहर रखरखाव का बजट कम दिया जाता है। विश्व बैंक समर्थित परियोजना से जहाँ किसानों के हित प्रभावित होंगें अथवा निजीकरण का प्रयास होगा तो हम विरोध करेंगें। किसानों को बचाने के लिए साझा संघर्ष जरूरी है।

सत्र संचालक की टिप्पणी – जल उपभोक्ता समितियाँ जन भागीदारी का नाटक है। इन समितियों के पास अधिकार तो ज्यादा होते नहीं। ये सिंचाई की दरें नहीं तय कर सकती। सिर्फ सरकार द्वारा बनाए कानूनों को लागू करवाना ही इनका काम है। वन समिति में भी स्वायत्तता नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि सरकारी काम को एक तथाकथित समिति द्वारा किया जाता है। पंचायती राज में भी यही हुआ है। पहले ठेकेदारों को काम दिया जाता था अब सरपंचों को।

सहभागियों को धन्यवाद के बाद कार्यशाला का समापन हुआ।

आमसभा सत्र

(सत्र संचालन – श्री चिन्मय मिश्रा)

आमसभा के कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए ‘मंथन’ के निदेशक श्रीपाद धर्माधिकारी ने विश्व बैंक के दबाव में पानी को राजनैतिक हस्तक्षेप से बाहर करने के प्रयास की निंदा की। उन्होंने कहा कि इससे सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से कमजोर लोगों के हितों पर कुठाराघात होगा। जो पैसा नहीं दे सकता उसे पानी देने से इंकार कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि नियामक व्यवस्था लागू होने के पहले इस पर प्रदेश में व्यापक बहस होना चाहिए।

‘प्रयास’ संस्था (पुणे) के निदेशक श्री सुबोध वागले ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ने जल नियमन प्राधिकरण के गठन के पूर्व अपेक्षित पारदर्शिता नहीं रखी। मात्र 6 स्थानों पर औपचारिक रूप से कार्यशालाएँ आयोजित की लेकिन न तो कार्यशालाओं में प्राप्त सुझावों को माना गया और न ही इन सुझावों को नकारने का कोई कारण बताया गया। यहाँ तक कि इन कार्यशालाओं के कार्यवृत्त भी अभी तक सार्वजनिक नहीं किए हैं। उन्होंने कहा कि इसे विधानसभा में भी एक सुनियोजित नीति के तहत बिना चर्चा के पारित करवाया गया।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित श्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि नियामक आयोग के गठन का अर्थ है कि सरकार ने पानी के निजीकरण का मन बना लिया है। जीवन के लिए जरुरी संसाधनों के निजीकरण का विरोध किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों ने पहले ही तय कर लिया है कि किस वर्ष में पानी की दरें क्या हो। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह दुःखद स्थिति है जो विधानमण्डलों को औचित्यहीन बना देती है।

भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन के श्री अब्दुल जब्बार कहा कि 1890 में भोपाल की रानी कुदसिया बेगम ने एक फरमान जारी कर पानी को खुदा की नियामत बताते हुए इसे किसी भी टेक्स से परे माना था लेकिन अब सार्वजनिक नलों को बंद कर लोगों को पानी से वंचित करने का फरमान जारी किया जा रहा है। बोतल और पाउच संस्कृति से यह जताया जा रहा है कि पानी बाजार की वस्तु है।

मध्यप्रदेश योजना मण्डल के उपाध्यक्ष श्री सोमपालसिंह शास्त्री ने कहा कि नियामक तंत्रों की वस्तुपरकता और विश्वसनीयता संदिग्ध रही है। सरकारी नीतियों का समर्थक करने वाले Nexus (गिरोह) से ही लोगों को इसमें लिया जाता है। उन्होंने कहा कि किसी न किसी रूप में नियामक तो जरूरी है लेकिन वे नियामक के वर्तमान स्वरूप का विरोध करते हैं।

उन्होंने अधीनस्थ विधानों अथवा नियमों (Conduct of Business)  के बारे में कहा कि ये वास्तव में विधानों को लागू करने में आसानी हेतु बनाए है लेकिन पिछले अनुभवों से पता चलता है कि इन अधीनस्थ विधानों को इस प्रकार तैयार किया जाता है कि उससे विधान लागू करना कठिन हो जाता है।

उन्होंने बजट प्राथमिकता बदलने की वकालत करते हुए कहा कि केन्द्र के 411 करोड़ के पानी के बजट में से 35 प्रतिशत राशि बाढ़ राहत के लिए है। उन्होंने भोपाल की 270 करोड़ की नर्मदा पेयजल योजना से असहमति दर्शाते हुए कहा कि 60 – 70 करोड़ रूपए में पूरे भोपाल जिले का जलग्रहण क्षेत्र विकास हो सकता है। उन्होंने कहा कि दिल्ली मे पानी का निजीकरण नौकरशाहों के निहित स्वार्थों से रूका। उनके मतानुसार साम्राज्यवादी ताकतें और सरकार तब ताकतवर होती हैं जब जनता कमजोर होती है।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्स॰) के प्रतिनिधि काॅम॰ पूषण भट्टाचार्य और गोण्डवाना मुक्ति सेना के प्रतिनिधि पं॰ रामलाल त्यागी ने नियामक व्यवस्था और पानी के निजीकरण के प्रयास का विरोध किया।
दैनिक भास्कर के राज्य प्रमुख श्री अभिलाष खाण्डेकर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में पानी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर जनमत के अभाव को रेखांकित किया। उन्होेंने कहा कि नियामक तंत्र के गठन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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सहभागियों की टिप्पणियाँ

  • नियामक की नियम-शर्तों में सामाजिक चिंताएँ शामिल की जानी चाहिए। इसका प्रारूप अखबारों में प्रकाशित कर जनता के विचार लिए जाने चाहिए। इसमें प्रशासनिक अधिकारियों के स्थान पर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को शामिल किया जाना चाहिए। नियामक तंत्र में प्रक्रियागत और विषयवस्तु की खामियों को दूर कर इसे मानवीय बनाया जाना चाहिए।

– के॰ जी॰ व्यास, भोपाल

  • ग्रामसभा हो या सिंचाई पंचायत या फिर निजी-सार्वजनिक भागीदारी यह सारा विकेन्द्रीकरण एक साजिश के तहत हो रहा है। इन ढाँचों को इस स्थिति में पहुँचा दिया जाएगा कि निजीकरण आसान हों।

– योगेश दीवान, होशंगाबाद

  • पानी हमारी मूलभूत जरूरत एवं है। इससे वंचित करना जीवन के अधिकार से वंचित करना है। हमें अपने अधिकारों से वंचित करने के प्रयास के खिलाफ आत्मरक्षा की रणनीति अपनानी चाहिए। सरकार तो प्रबंधनकर्ता मात्र हैं हम उसके मालिक हैं। हम अपनी ताकत दिखाएँ।

– शिवदयाल बौंठियाल, कोटद्वार (उत्तराखण्ड)

  • सिंचाई तत्र के इस तथाकथित विकेन्द्रीकरण में जल उपभोक्ता संस्थाओं की भूमिका सीमित है। यह विकेन्द्रीकरण का दिखावा मात्र है।

– अनंत जौहरी, जमुड़ी (अनूपपुर)

  • नियामक आयोग एक दुकान है। इसमें वही लोग शामिल होंगें जो संसाधनों को बेचने और लूटने के पक्षधर हैं। इसका कड़ा विरोध किया जाना चाहिए। हमारे विरोध की ताकत से ही तय होगा कि सरकार अपने मंसूबों में कामयाब हो पाती है अथवा नहीं।

– भगवान मुकाती, नर्मदा बचाओ आंदोलन

  • जल संसाधनों में प्राथमिकता लोगों की आजीविका के बजाय उद्योगों को दी जा रही है। छत्तीसगढ़ की शिवनाथ नदी की 23 किमी धारा को उद्योगपति के हाथों बेच दिया गया था। कंपनी ने नदी के 5 किमी मीटर के दायरे में हेण्डपम्प भी नहीं लगने दिये क्योंकि कंपनी के अनुसार भू-जलस्तर में वृद्धि उसके एनीकट की वजह से हुई। आज छत्तीसगढ़ की नदियों का सारा पानी भिलाई इस्पात संयंत्र को दिया जा रहा है। यह उपनिवेशवादी नीति इस कारण चल पा रही है कि इसमें हमारी सरकार भी शामिल है। सरकार के नवउदारवादी रूख के खिलाफ हमारी रणनीति पर विमर्श जरूरी है।

– सारिका सिन्हा, भोपाल

  • छत्तीसगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा और सिवनी तथा महाराष्ट्र के चंद्रपुर में तालाबों की परम्परा रही है। वहाँ तालाबों के प्रबंधन तथा नियंत्रण के लिए अनूठी नियामक व्यवस्था रही है जिसमें मुख्यरूप से भूमिहीनों को शामिल किया जाता था, क्योंकि भूमिहीनों के पानी पर हित भिन्न प्रकार के होते हैं। इससे संसाधनों पर नियंत्रण कायम रहता था। इसके विपरीत सरकार द्वारा निर्मित संसाधनों में कोई नियंत्रण नहीं होता है।

– राकेश दीवान, भोपाल

  • महाराष्ट्र में हर क्षेत्र में power structures  बन गए है। गाँव की सहकारी समिति से शकर कारखाने तक और काॅलेज तक ये power structure  है। सरकारी आदेश से जल उपभोक्ता समितियाँ बनाई जा रही है। इसका उपयोग दलीय राजनीति में होने से इसकी मूल भावना (Spirit)  खत्म हो जाएगी। जिस प्रकार पहले शकर कारखाना तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर गाँव से लेकर ऊपर तक कब्जा हुआ उसी तरह अब पानी पर कब्जा करने में इस ढाँचे का उपयोग किया जाएगा। ‘पानी पंचायत’ जैसे आदर्श उपभोक्ता संघ काफी कम है और इनकी सफलता का राज यह है कि यह ढाँचा स्थानीय जरूरत के आधार पर बना है। जब उपरी आदेश पर ऐसी संस्थाएँ बनेगी तो इस ढाँचे को नजरअंदाज किया जाएगा। और कुछ वर्षों में ये ढाँचे खत्म भी हो जाएँगें और किसानों को पानी भी नहीं मिलेगा।

– सुबोध वागळे, पुणे

  • कई शहरों ने अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों से कर्ज लिया है। ऐसे में इनका प्रयास होगा कि जल्द से जल्द नियामक आयोग बनें।

– तपन भट्टाचार्य, इंदौर

  • मुझे लगता है कि यदि एडीबी/विश्व बैंक के कर्ज नहीं होते तब भी पूँजीवादी विश्व व्यवस्था में स्थिति इससे अलग नहीं होती।

– प्रदीप सिंह, भोपाल